
संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण ने देश की आर्थिक दशा की जो तस्वीर खींची है, उससे स्पष्ट है कि आने वाले समय में डीजल और एलपीजी के साथ ही खाद्य सब्सिडी निशाने पर हो सकती है। शिकागो विश्वविद्यालय से संबद्ध मुख्य आर्थिक सलाहकार रघुराम राजन की अगुआई में तैयार किए गए इस दस्तावेज को चेतावनी माना जाए, तो यदि सब्सिडी में कटौती नहीं की गई, तो वैश्विक स्तर पर हालात सुधरने के बाद भी हमारी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
अमूमन सरकार की आर्थिक नीतियों को प्रतिबिंबित करने वाले इस दस्तावेज में स्वीकार किया गया है कि तमाम अटकलों के बावजूद इस वर्ष विकास दर पांच फीसदी के आसपास ही रहेगी। दरअसल यही खतरे की घंटी है, क्योंकि पिछले वर्ष तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने विकास दर के 7.6 फीसदी रहने का अनुमान व्यक्त किया था और उसके बाद पूरे साल भर सरकार की विभिन्न एजेंसियां 5.5 से 6-7 फीसदी के आंकड़ों के बीच झूलती रही हैं। इसलिए यदि आर्थिक सर्वे में अगले वर्ष के लिए 6.1 से 6.7 फीसदी की विकास दर का अनुमान व्यक्त किया गया है, तो उसके लिए सरकार को कठिन रास्तों से भी गुजरना होगा।
इसके लिए जो नुस्खे बताए गए हैं, उन पर अमल करना आसान नहीं होगा। इसका सबसे बड़ा कारण तो यही है कि वित्त मंत्री आज जो बजट पेश करेंगे, वह 2014 के आम चुनाव से पहले यूपीए के दूसरे कार्यकाल का आखिरी पूर्ण बजट होगा। इसी सत्र में खाद्य सुरक्षा बिल भी पेश होना है, जिसे सरकार अधिक दिनों तक नहीं टाल सकती। मुश्किल यह है कि पिछले कार्यकाल की मनरेगा जैसी इस कल्याणकारी योजना को आर्थिक सुधारों के हिमायती फिजूलखर्ची मानते हैं।
उनके मुताबिक आर्थिक सुधारों में तेजी लाने के साथ ही आधारभूत संरचना और सरकारी अड़चनों को दूर करने की जरूरत है, ताकि निवेश बढ़ाया जा सके। बेशक, मंदी कम होने का आकलन उत्साह जगाता है, क्योंकि देर-सबेर इससे महंगाई भी कम होगी और जैसा कि सर्वे में उम्मीद जताई गई है, ब्याज दरों में भी कटौती हो सकेगी। मगर इस सर्वेक्षण ने एक बार फिर दिखाया है कि अर्थनीति के साथ ज्यादा राजनीति नहीं होनी चाहिए।
